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उत्सर्ग

उत्सर्ग छात्र अवस्था से कविता लिखने का प्रबल आवेग धीरे-धीरे मेरे परिपक्व  वयस में आसक्ति के रूप में रूपांतरित होता गया,जिसका उत्स मेरे पिता स्वर्गीय  रूद्रमोहन मिश्रा,माता स्वर्गीय कृष्णप्रिया देवी की प्रेरणा और प्राणप्रिय पत्नी श्रीमती कानन बाला की नीरव आकृति ने इस कविता-संग्रह को पुस्तक का रूप प्रदान किया है।मेरे पुत्र,पुत्र-वधूएं,पुत्री,दामाद,पोते-पोतियां और पोत्र-बहू,सभी के सामूहिक उत्साह ने इस पुस्तक के प्रकाशन-कार्य में सहायता की हैं।पोती आद्याशा की लगन और मेहनत तो अत्यंत ही प्रशंसनीय रही है। “सीमंतिनी” के विमोचन-अवसर पर अपने स्वर्गीय माता-पिता और वामांगी स्वर्गीय कानन बाला की स्मृतियों को इस कविता-संग्रह में समर्पित कर अपने आपको भाग्यशाली मानता हूं। ब्रह्मानंद मिश्र “काननीका” रेमुआं,तालचेर अंगुल

भूमिका

भूमिका कवि के इस कविता-संग्रह “सीमंतिनी” में 61 कविताएं प्रकाशित हुई हैं।इन कविताओं में अलग-अलग विषयवस्तु हैं।कभी बचपन की मधुर स्मृतियाँ तो कभी किशोरावस्था में बंधु-बांधवों से हुई झड़प और माता-पिता से जुड़ी हुई यादें हैं,जो उनकी कविताएँ ‘आत्मपरिचय’,‘स्मृति-परिणय’’, ‘मेरे लिए’,‘तुम्हारे लिए’, में प्रकट होती हैं। ‘स्मृति-परिणय’’ में कवि अपने विवाह की यादों को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करता है। इस कविता की  निम्न पंक्तियाँ  इसका उदाहरण हैं:- पुरोहित के मंत्र श्लोक,आहूति सुसज्जित मंडप वेदी पर सुशोभित अग्नि कविता ज्योति सूर्याग्नि-सी मंडप की अग्नि सर्व समक्ष रखकर साक्षी पाणि-ग्रहण के बाद सिंदूर तिलकित भाल सीमन्तिनी वेश में सजी-धजी अपलक निहारता आत्मविभोर होकर शोभा उसकी  इसी तरह उनकी कविताओं में कभी जीवन के उत्तरार्ध की व्यथा,निसंगता और एकाकीपन उनकी कविताओं ‘लक्ष्मण-रेखा’,‘कानन-बाला,’ ‘निसंग जीवन’ में उभर कर सामने आता हैं। ‘लक्ष्मण-रेखा’’ की पंक्तियाँ द्रष्टव्य है:-  महासती साध्वी सीता जैसी नारी सोने की मायावी हिरण के मरीचिका लोभ में बिन बुलाया दुख आमंत्रि...